वसंती हवा

कोकिला
लावण्या शाह  

 

कोकिला ओ कोकिला

ऋतु वसंत ने पहने गहने-
झूम रहीं वल्लरियाँ।
मधु गंध उड़ रही चहुँ दिशि
बहे मीठे जल की निर्झरियाँ
आ गया आ गया वसंत
कूक उठी है कोकिला।

शतदल-शतदल खिली कमलिनी
मधुकर से है गुंजित नलिनी
केसर से ले अंगराग
नाच रही चंचल तितली
रति अनंग का गीत प्रस्फुटित
बोल उठी है कोकिला।

झूल रहीं बाला उपवन में
बजती पग में किंकिणियाँ
चपल चाल से मृदुल ताल से
हँसती खिलती हैं कलियाँ
नाच रहा जग नाच रहा मन
झूम उठी है कोकिला।

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics


 

website metrics