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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

बादल गीत

बिन बरसे मत जाना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना।

मेरा सावन रूठ गया है
मुझको उसे मनाना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना!

झुकी बदरिया आसमान पर
मन मेरा सूना।
सूखा सावन सूखा भादों
दुख होता दूना
दुख का
तिनका-तिनका लेकर
मन को खूब सजाना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना!

एक अपरिचय के आँगन में
तुलसी दल बोये
फँसे कुशंकाओं के जंगल में
चुपचुप रोए
चुप-चुप रोना भर असली है
बाकी सिर्फ़ बहाना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना।

पिसे काँच पर धरी ज़िंदगी
कात रही सपने!
मुठ्ठी की-सी रेत
खिसकते चले गए अपने!
भ्रम के इंद्रधनुष रंग बाँटें
उन पर क्या इतराना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना!

मेरा सावन रूठ गया है
मुझको उसे मनाना रे बादल!
बिन बरसे मत जाना!

- कन्हैयालाल नंदन
18 अगस्त 2001

  

सावन की रिमझिम

सावन की रिमझिम आभा से
मन हर्षित भाव-विभोर हुआ
पीहू-पीहू पपीहा बोल उठा
कुह-कुह कोयल का शोर हुआ

हरियाला परिधान धारकर
वसुंधरा ने शृंगार किया
शीतल मंद पवन ने आकर
लताओं से प्यार किया

चम-चम, चम-चम चपला चमके
छाती चाक करे नभ की
छम-छम, छम-छम गिरती बूँदें
मदिरा बनी धारा लब की

इस मंज़र की एक झलक को
अँखियाँ तरस रही कब की
ये सावन तो ऐसा बरसे
प्यास बुझाए जो सबकी

मन मोर झूम कर नाच उठा
काश सदा ये बात रहे
रुक जाए समय की गति
यों ही, खुशियों की ये बरसात रहे।

यशपाल सिंह 'रवि'
16 सितंबर 2003

वर्षा की वे पहली बूँदें

ग्रीष्म ऋतु कर रही पलायन
वर्षा का हो रहा आगमन
सब चाहते आंदोलित होना
छत पर अब भी बिछे बिछौना
सबको इंतज़ार कि छू लें
वर्षा की वो पहली बूँदें

प्रीतम से है प्रेयसी रूठी
खाई थीं क्यों कसमें झूठी
मौका है प्रिया मनाने का
क्रोध के बादल छँट जाने का
प्रीत के द्वार यकीनन खोलें
वर्षा की वो पहली बूँदें

मोर-पपीहा बाट जोहते
खेत सदा इंतज़ार में रहते
सब के तन मन को हर्षाती
जड़ चेतन आनंद दे जाती
मन कहता बस आकर बोलें
वर्षा की वो पहली बूँदें

- घनश्याम दास आहूजा
10  सितंबर 2001

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