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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

घन गरजे

सखि, वन-वन घन गरजे!
श्रवण निनादा-मगन
मन उन्मन
प्राण-पवन-कण
लरजे!

परम अगम प्रियतमा गगन की शंख-ध्वनि आई
मंथर गति रति चरण चारू की चाप गगन में छाई
अंबर कंपित पवन संचारित संसृति अति सरसाई
मंद्र-मंद्र आगमन सूचना हिय में आन समाई
क्षण में प्राण उन्मादी
कौन इन्हें अब बरजे?

मेरा गगन और मम आँगन आज सिहर कर काँपा
मेरी यह आल्हाद बिथा सखि, बना असीम अमापा
आवेंगे वे चरण जिन्होंने इस त्रिलोक को नापा
सखि मैंने ऐसा आमंत्रण-श्रुति स्वर कब आलापा?
लगता है मानो ये बादल कुछ यों ही हैं तरजे!

श्रवण-निनाद-मगन
मन-उन्मन
प्राण-पवन-कण
लरजे!

- बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
12 सितंबर 2001

  

मेघदूत

उमड़ती घुमडती काली घटाएँ
छा गई चहुँ ओर!

बिजलियों की चकाचौध
मेघों का चीत्कार
हवाओं के तेज़ झोंकों का
स्पंदन फैल रहा
बूँदे आ आकर दे रही संदेश
मेघदूत इस ओर!

टप-टप करती सुर लहरी
बनी मृदुल
टूट पड़ी अविरल धार
रूप बनी विकराल
जल मग्न हो गए
खेत और मेड़ों के तट।

उमड रहा आकाश
अठखेलियाँ कर रहा बादल
सूर्य रश्मियाँ बिछाने लगी
चादरें हरी-हरी
फूटने लगी कोपलें नयी
मन भावन सावन में
भीनी खुशबू बिखेरती मेहँदी
इठलाती बलखाती
गलियों से गुज़रते
सघन घन घोर!

तन बदन पुलकित मन
कल्पनाओं के संग
भीग गया सब ओर
मुदित मन मोर!

- बृजेशकुमार शुक्ल

25 अगस्त 2001

 

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