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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

पावस गीत

छंद आज रस भीगे, गंध-नदी बहती है।

बनपाँखी लौट रहे बाँस-बन हरे-हरे
धुँधुआती धरता पर चंदन से मेघ झरे
बूँदनियाँ पूछ रहीं, प्यास कहाँ रहती है?

नटनी-सी नाच-नाच मगन मुई बौराई
खुले आम यौवन-घट हरियाली भर लाई
इस जवान बेटी को, माँ-धरती सहती है।

पलक-पलक इंद्र धनुष बनते हैं, मिटते हैं
अँगना के अधरों से गीत-शिशु लिपटते हैं
अँगड़ाई लेने दो, परंपरा कहती है।

नारायणलाल परमार
10 सितंबर 2005

  

बारिश

नंगी पहाड़ियाँ
तान लेती हैं
हरी चुनरिया

खेतों में लहलहाती है
बालियों की ताज़गी

घूँघट ओढ़े पोखरों से
तकती है
प्रकृति

'काकू' के खलिहान के
उस ओर बँध जाता है
इंद्रधनुष

बच्चे भीगी बालू से
बनाते हैं घरौंदे

बारिश में
एक कविता-सा
लगता है
गाँव मेरा।

जितेंद्र दवे
10 सितंबर 2005