अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में दीपिका ओझल की
रचनाएँ—

नई कविताएँ—
कैसे कहूँ
चंदा
तिमिर को चीर कर
मुश्किल


कविताओं में-
काश
तुहिन की बूँद
दीया
मन का मनका
मैं पगली
सखी

 

काश

हिय प्रांगण वीरान न होता
पीड़ा का मुझे भान न होता

कल्पनाओं को पंख न लगते
अभिव्यक्ति उन्मान न होता

नैनों से काजल न बहता
स्वप्न कोई पलकों पे रहता

न टूटी मन तारें होती
न यों नित तकरारे होती

मुस्काने को मुझ पाधर के
होंठ अगर ये हिले न होते

फूल अधूरी आशाओं के
मरुमि पर खिले न होते

काश
हमें तुम मिले न होते

९ अक्तूबर २००५

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics