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अनुभूति में राकेश कौशिक की
रचनाएँ -

गीतों में-
अब मुझको आवाज़ न देना
आशा दीप
एक दीपक जल गया है
और बरस थोड़ा सा बादल
किसे मन की बात कह लूँ
कोहरा ये कब हटेगा
नव जीवन
बादलों तुम आ गए फिर
मन में छाया घोर अंधेरा
मेरा शहर बदल गया
मेरा वतन बदल गया
समय काटे नहीं कटता

स्वप्न में कल आई थी तुम

हम बंजारे
हम मछुआरे
है कठिन पथ

अंजुमन में—
इंसान बदल जाएगा
कब से खड़े हैं
कौन कहता है देश जागा है
गीत मेरे हैं तुम्हारे
जाने क्यों
जो इधर था
जो न झुकते थे
जो फ़ोर्स
तुम नज़र से दूर हो
तुमने मुझे पुकारा होगा
मिट्टी उड़ती है
मेरी धरती के लोगों
यदि आज है दुख
सब का सब कुछ
हर सहारा
हवाओं में

कविताओं में —
ऋतुचक्र
तुम न आए
भटके भटके हुए
महानगर
सूरज का इंतज़ार

संकलन में-
प्रेम गीत-आज उनसे
जग का मेला-मेरा भैया

 

भटके-भटके हुए

भटके-भटके हुए, बहके-बहके हुए,
क़ाफ़िले ये उजड़ कर किधर हैं चले।
है धुआँ आँखों में, तन पे चिथड़े लिए,
पेट की आग में ये झुलसते चले।

कोई रहबर नहीं, न कोई रहनुमाँ,
हैं बिछाते ज़मीं, ओढ़ते आस्माँ,
पंजरों से बदन, होंठ पथराए से,
दर्द की दास्तानें सुनाते चले।

हैं जिए जा रहे बोझ मन पर लिए
क़ैद जिस्मों के पिंजरों में रूहें किए।
डूबती नब्ज़ हाथों में थामे हुए।
मार कर सारे अहसास लुटते चले।

24 दिसंबर 2004

 

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