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कुछ क़तए
कुछ रुबाइयाँ
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कौन देता है कौन पाता है
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जिस पे तेरी नज़र
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तेरे आने की ख़बर
दिल का दरवाज़ा
दिल का मेरे
दिल के रिश्ते
नीम के फूल
फूल ही फूल

फूल उनके हाथ में जँचते नही
मान लूँ मै
मिलने का भरोसा
याद आए तो
याद की बरसातों में
याद भी आते क्यों हो
ये राह मुहब्बत की
लोग हसरत से हाथ मलते हैं

वो ही काशी है वो ही मक्का है
साल दर साल

`

बात सचमुच

बात सचमुच में निराली हो गईं
झूठ जब बोला तो ताली हो गई

फेर ली जाती झुका कर थी कभी
उस शरम से आँख खाली हो गई

मिल गई उनको इजाज़त जुल्म की
अपनी तो फ़रियाद गाली हो गई

इक नदी बहती कभी थी जो यहाँ
बस गया इंसा तो नाली हो गई

ये असर हम पे हुआ इस दौर का
भावना दिल की मवाली हो गई

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
वो समझ पूजा की थाली हो गई

हाथ में क़ातिल के ''नीरज'' फूल है
बात अब घबराने वाली हो गई

१७ नवंबर २००८

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