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ज़रूरी है
बचकर रहना
बेटियों की मुस्कान
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सात मुक्तक

क्षणिकाओं में—
दस क्षणिकाएँ

गीतों में—
आ भाई सूरज
इस बस्ती मे
उजियारे के जीवन में

उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

  धूप ने

धूप ने
उठते बगूलों-
के इधर ही रुख मोड़े
खींचकर
पछवा हवा की-
डोर, तीखे बाण छोड़े।

घास है
झुलसी हुई-सी
और नभ में भी जलन है
तप रहा
अंगार जैसा
धरा का
नंगा बदन है
जल हुआ तेजाब तीखा
धूल के
चलते हथौड़े।

नई डामर-
की सड़क भी
अब भाड़-सी
तपने लगी
छाँव की
किलकारियाँ भी
रह गई
जैसे ठगी,
आग ने
चुपचाप आकर
पीठ पर जड़ दिए कोड़े।

१ जनवरी २००५

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