अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


प्रेम माथुर

  आठ क्षणिकाएँ

1

बरसा फिरता
कहाँ-कहाँ
प्यासा का प्यासा फिर भी
पागल है
कितना बादल


2

हम हों
बगिया में
कविता और स्वर हों
फिर तुम हो न हो।

3

होती नहीं
ज़रूरत किसी को फूलों की
खुशबू जब फैलती है
लोग अपना ही लेते हैं।

4

जाएँगे अकेले
हम कहाँ
जाएँगे गाहे बगाहे
चार काँधे साथ।

5

रो भी नहीं सकते हम
खुल कर यार
उसके लिए भी
चाहिए एक काँधा प्यार।

6

पड़े-पड़े उलझ जाते हैं
क्यों धागे
रिश्ते

7

एक नाज़ुक किरण
कब किस तरह
किस मूरत पर पड़े
कब किसको किस पर
प्यार आजाए
क्या पता

8

लव कॉम पर जाइए
प्यार अपना पाइए
झूठा सच

09 फरवरी 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।